विनय के बोल : मेरे जिंदगी के 6 साल कुछ ऐसे बीते की जिस शहर से शुरुआत हुई , आज उसी शहर में हूं

 


आज जॉब छोड़ हुए एक साल से भी ज्यादा समय हो गया है और मेरे मन में तरह-तरह के विचार उमड़-घुमड़ रहे हैं। शहर दर शहर घूमते हुए फिर से इंदौर की शरण में आ गया हूं। सही मायने में कहा जाए तो मैंने जीवन जो थोड़ा बहुत सीखा है वो इसी शहर से सीखा है। मैं इसे इस तरह से कह सकता हूं कि जीवन में कुछ नया करने की चाह लेकर सबसे पहले में इंदौर ही आया था। एमपी का सबसे बड़ा शहर इंदौर मेरे लिए बड़ा नहीं है बल्कि सीखने का नया जरिया रहा है। यहां के वातावरण में नई खुशबू है जो मैंने आज से 6 साल पहले महसूस की थी। 

जब मैंने इंदौर में कदम रखे थे तो बड़े शहर से अंजान न था लेकिन अनुभव नहीं था। कैसे बड़े शहर में रहा जाता है? कैसे बड़े शहर के लोग रहते हैं? कैसे लोग यहां गुजर बसर करते हैं? मेरे लिए सबकुछ नया था। छोटे से शहर कटनी से मैं इंदौर आया था कुछ बनने। साल 2015 की बात है तब मैं अंकुर की तरह था मतलब जिसके लिए सबकुछ नया था। सिविल सर्विस की कोचिंग के लिए इंदौर आकर नये-नये लोगों से मिला, उनके कल्चर को जाना, नए-नए शब्द जाने, खान-पान सबकुछ जाना। ये मेरे लिए पहला मौका था जब मैं घर से दूर लंबे समय के लिए अंजान लोगों के बीच अपनी पहचान बना रहा था। 

पढ़ाई तो जैसे-तैसे हो ही रही थी। कोचिंग भी ज्वॉइन कर ली थी। पहली सिविल सर्विस के प्री एग्जाम के लिए बैठा तो निराशा ही हाथ लगी थी। उस समय लगा था सबकुछ हाथ से निकल गया लेकिन स्कूल और कॉलेज से अलग एक नए दोस्तों के माहौल में मुझे कुछ नया करने का मौका मिला। ऐसा नहीं था कि कॉम्पीटिशन एग्जाम के बारे में बिल्कुल नहीं जानता था लेकिन इंदौर आकर मैंने इसे अनुभव किया। हजारों बच्चे अपने घरों से दूर एक नई उम्मीद की तलाश में आते हैं। किसी की उम्मीद का दिया जलता है और किसी का बुझ जाता है। 

मैंने कभी भी एक साथ सीखने की कोशिश नहीं की थी। अलग-अलग स्तरों पर सीखने की कोशिश की थी। स्कूल में अलग ज्ञान की बात सीखी, कॉलेज में अलग और कोचिंग में जो सीखा वो सबसे अलग था। कोचिंग में कुछ हद तक स्कूल और कॉलेज का ज्ञान मेरे काम आया। दूसरे प्रयास में प्री तो पास कर लिया लेकिन मेंस क्वालिफाई नहीं कर पाया। ऐसा लगा जिंदगी में कुछ बचा ही नहीं है। मैं अपने परिवार के लिए सबसे ज्यादा शुक्रगुजार हूं उनका हर मोड़ पर साथ मिलता रहा। मैं जो कुछ भी नया करना चाह आजादी मिलती रही। 

मेंस क्वालिफाई न करने पाने के बाद मैंने माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय में कोर्स ज्वॉइन करने की ठानी। मैं उन लोगों में से एक था जिन्होंने अपने पीछे यादें छोड़कर आईं थीं। मेरी यादें मेरे साथ ही थीं जो समय के साथ धुंधली होती गईं। इंदौर की यादें धुंधली होती गईं लेकिन नई यादें सजती गईं। एमपी के अलावा दूसरे राज्यों के लोगों से मेलजोल बढ़ा। दायरा यूपी, बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, दिल्ली जैसे राज्यों तक पहुंचा। लोगों से बहुत सीखने को मिला। असल में कहूं तो भारत को जानने का मौका मिला। कई बड़े-बड़े आयोजनों का हिस्सा बना, बड़ी-बड़ी शख्सियत को सुनने का मौका मिला, स्वस्थ बहस का हिस्सा भी बना।

भाषा के नए-नए आयाम को जाना, इसी दौरान मैंने टाइपिंग करना भी सीखा।  भोपाल से पीजी करते हुए जो मैंने सबसे अच्छी बात सीखी वो थी लोगों से बात कैसे की जाती है? लोगों से मेलजोल कैसे बढ़ाया जाता है? समय बीतते देर नहीं लगता है। मुझे वो दोहा अक्सर याद आता है, 

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सबकुछ होय ।

माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आये फल होय।। 


जिंदगी में जब सबकुछ अच्छा चल रहा होता है तभी कुछ बदलाव आ जाता है। वो बदलाव भी इतना अलग होता है कि आपको समझने में देर लग जाती है। यूनिवर्सिटी में दो साल कैसे बीत गए पता ही नहीं चला। कई कैंपस आया और लोगों को अपने साथ ले गए। मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी मैं एबीपी न्यूज जैसे बड़े न्यूज चैनल में काम करूंगा। मेरे लिए ये एक ब्रांड जैसी बात थी। कैंपस से पहले तक मेरा और इंद्रभूषण मिश्र हम दोनों ने तय किया था कि हम भोपाल में रहेंगे और एम फिल की तैयारी करेंगे। आखिरी समय तक भी हम इसके लिए तैयार नहीं थे। जब मेरा एबीपी न्यूज के लिए सिलेक्शन हुआ तो इंद्रभूषण ने भोपाल छोड़ना मुनासिब समझा। 

मैं नोयडा पहुंच गया और वो रायपुर । हम दोनों अलग हुए और राहें भी अलग हो गईं। वो डिजिटल के लिए आईएनएच के लिए काम करने लगा और मैं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए। 2018 से 2020 कैसे बीते पता ही नहीं चला। साल 2020 के आखिरी में ही मेरा मन ऐसा बदला की रहा नहीं गया। अगस्त आते-आते मैंने इस्तीफा दे दिया। समय का पहिया बड़ी जोरदार तरीके से घूमता है। सिंतबर 2020 में घर की रुख किया और अपने आप को तैयार करने में लगा रहा । तैयारी मानसिक रूप से ज्यादा थी क्योंकि मेरा सबसे कमजोर हो गया था। 

आखिरकार मैंने सोच लिया करना क्या है? मैंने पीएससी की कोचिंग करने की ठान ली। ऑनलाइन कोचिंग ज्वॉइन कर ली। कोचिंग पढ़ता तो था लेकिन मन लगाना आसान न था । इतने साल एक अलग दुनिया में रहना फिर एक ऐसी दुनिया में जाना जहां सपना सच करने के लिए लाखों लोग चूहे की तरह दौड़ लगा रहे हैं। पता नहीं क्या होगा? जीवन संघर्षमय होता है और दुनिया निर्दयी। मैंने जिस शहर से अपनी जिंदगी की शुूरूआत की थी आज वहीं पर आ गया हूं। आगे क्या होगा नहीं पता। जो भी होगा अच्छा ही होगा। जिंदगी जहां लेकर जाएगी अच्छी जगह ही लेकर जाएगी। 

इंदौर आने के बाद मैंने जो सबसे बड़ा बदलाव ये देखा कि इंदौर अब वो 6 साल पुराना शहर नहीं है। कईृ-कई सारी मल्टीस्टोरी बिल्डिंग बन गई हैं। कई जगहों का हुलिया बदल गया है। लोग ज्यादा एडवांस हो गए हैं। सार ये हैं कि मेरा इंदौर बदल गया है। इस बदलाव की अपेक्षा की जाती है क्योंकि इंदौर लगातार 4 बार भारत का सबसे साफ शहर बन चुका है। 

विनय की कलम से...विनय के बोल

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